दो लघु कथाएँ


 


लघु कथा 1. 

गाड़ी

सोनी जी ने बेल्ट के बंधन को थोड़ा ढीला करने की कोशिश करते हुए कहा सुरक्षा की दृष्टि से ही सही ये बंधन हमें बिलकुल पसंद नहीं, पर क्या तो करें इन बन्धनों का।’ सोनी जी अभी भी असहज सी बेल्ट को बार-बार आगे पीछे कर रही थी।

स्वाति सावधानी पूर्वक स्टीयरिंग व्हील पर मजबूत पकड़ बनाए हुए उन पर एक दृष्टि डालते हुए कहा-

पर बेल्ट भी तो जरूरी है न!  फिर हँसते हुए बोली ‘मैडम सावधानी हटी दुर्घटना घटी’

लेकिन सोनी जी ने स्वाति की हँसी में साथ न दिया तो स्वाति के होंठ वापस सिकुड़ गये अब उसका ध्यान गाड़ी चलाने पर था

कुछ क्षण की ख़ामोशी के बाद सोनी जी भूमिका-सी बनाती बोली-

एक बात तो है, स्टीयरिंग व्हील पर तुम्हारा होल्ड कमाल का है, अच्छी गाड़ी चला लेती हो

 स्वाति ने राहत की साँस ली और अपने पढ़े गए पेपर पर दी गई उनकी नकारत्मक टिप्पणी याद करते हुए पहले  हँसी, लेकिन ताना-सा देती हुई लगभग कुछ कुरेदते हुए बोली  

ओह... अच्छा ! मुझे लगा आप फिर मेरे पेपर पर कोई टिप्पणी देना चाह रही हैं 

अब ठहाका लगाने की बारी सोनी जी की थी बेल्ट से छेड़छाड़ करती बोली-

टिप्पणी या प्रश्न? फिर...और जवाब भी कहाँ हैं हमारे प्रश्नों का!! तुम्हारें इन कागज़ी विमर्शों में, जो जहाँ तहां सजे-धजे बैठें हैं !!’

सच में जवाब तो नहीं था स्वाति के पास, उसने अपने पेपर में जो भी पढ़ा, वो पढ़ा-लिखा हुआ ही तो था ज्ञान और अनुभव की गहराई में गोता लगाने का अवसर ही कहाँ मिल पाता है, ये तो पॉइंट का चक्कर है वर्ना। उसे याद हो आया सोनी जी का प्रसिद्ध वाक्य जो अक्सर दोहराती है-

‘विमर्श अगर अनुभव की आँच पर ना पका हो तो जंक फूड की तरह होता है...लाया, खाया और अघाया। शौक-शौक में लाया मजे-मजे में खाया और फिर अघाय-के सो गए’।

और सचमुच वे बोल रही थीं - ‘विमर्श अब किताबों ,शोध ग्रंथों और सेमिनारों की ही शोभा बढ़ाते है’

स्वाति ने बात काटते हुए कहा- अरे घर पर बात करनी थी...उसने स्पीकर पर ही फ़ोन लगाया और बेटे से बात करने लगी।  

फिर फ़ोन रखने के बाद पूछा – ‘आप कुछ कह रही थी मैम? 

सोनीजी खूब समझती हैं कि कौन कब उन्हें काट रहा है मुस्कुराते हुए बोली तुम्हें गाड़ी चलाते देख अच्छा लग रहा है, जानती हो स्वाति जब छोटी थी तो सपना था, पति के बगल में सज-संवर कर बैठे और वो चाहे जहाँ ले जाए और हम बेफिक्र आनंद से बैठे रहें लेकिन आज तुम्हें देखकर एहसास हो रहा है कि एक लड़की जब गाड़ी चलाती है तो उसे कितना मज़ा आता होगा ? अपनी मर्ज़ी से जहाँ चाहे जिस भी गति में गाड़ी मोड़ ले, खिड़की खोले, ठंडी हवा अंदर आती रहे और बालों को संवारने का भी मौका न मिले, बस गति के साथ उड़ती चली जाएँ ! सच में! खुद गाड़ी चलाने का जो सुख है वो बगल में सजधज कर बैठने में कहाँ? 

अचानक स्वाति एक भद्दे कमेंट के साथ ब्रेक लगाते हुए एक साईकल वाले पर चिल्लाई-

बत्ती नहीं दिखती तेरे को.... तब उस अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने भी भाई-भतीजावाद अपनाते हुए बहन-माँ के विशेषणोंके साथ जवाब दिया तेरे को गाड़ी किसने दे दी? जब चलानी नहीं आती तो घर पर बैठ न!’  

स्वाति ने पलट कर जवाब नहीं दिया और ब्रेक के साथ अचानक बंद हुयी गाड़ी को पुनः चालु किया, मन खिन्न हो गया सोनीजी की बात का क्या जवाब देती, कुछ भी बोलने को मन नहीं हो रहा था क्या बताती कि घर पहुँचते पहुँचते ब्रेक मार-मार कर कितना थक जाती है,  सारा दिन खड़े खड़े पढ़ाना घर तक तो पूरा दम निकल चुका होता है टाँगों का, और फिर जाकर एक घंटा रसोई में...एक पल को मन किया कि दर्द बयां करूँ फिर याद आया अभी तो सीता सावित्री,शकुन्तला के उदाहरणों द्वारा स्त्री का महिमामंडन कर आईं हूँ, सोनी जी को तो मौका मिल जाएगा फिर लेक्चर देने लगेंगी

सोनी जी ने ही चुप्पी तोड़ी लम्बी साँस भरते हुए कहने लगी-  

'गाड़ी हो या जिंदगी इन रास्तों पर हमें अकेले चलने का सुख जाने कब मिलेगा! देखो न, अपनी गलती को किस धृष्टता से ये हमारे ऊपर लादकर चलता बना, सारे ट्रैफिक नियमों को ताक पर रख कर, लालबत्ती का इंतज़ार किये बिना सड़क पार कर गया , उस पर घर पर बैठने का उपदेश भी हमें दे गया  ...’

उदास स्वाति के मुँह से बड़ी मुश्किल में बोल फूटे  ‘मैम ये तो रोज़ का ही किस्सा है मेरी जगह अभी कोई आदमी गाड़ी चला रहा होता तो क्या मजाल कि कोई साईकल वाला यों चिल्ला कर अपशब्दों की बौछार कर चलता बनता, सारे नियम कायदे कानून हमारे ही लिए तो हैं बस! अब कौन लड़े रोज़ रोज़’।

सोनीजी- ‘सही कहती हो,अगर हम भी आक्रामक मुद्रा में आ जाये तो विध्वंस के अलावा बचेगा क्या? 

स्वाति ने भी तटस्थ मुद्रा में जवाब दिया ‘तभी तो डिफेन्स की मुद्रा में गाड़ी चलाते चली जा रहीं है हम!!

लेकिन कब तक?

 

 

 

लघु कथा -2.




फैसला

बहु को इशारे से रसोई में चले जाने का आदेश देकर खाना खाते हुए बेटे को डांटते हुए माँ ने शिकायती लहजे में कहा –

अरे,गोबिंद, मैंने तुझसे क्या तो बोला था कि तेरी लाडली छोरी 'मर्जी से शादी करूंगी' की रट लगाए है, उसे समझा ! न माने तो डरा-धमका हाथ पैर तोड़ के घर में पटक! और तूने अनोखा ही काम किया!! चंद रुपयों की प्राइवेट नौकरी करने के लिए हामी भर दी!! अब नौकरी के लिए बाहर जावेगी क्या-क्या करेगी भाई ...

कोई ज़वाब न मिलने पर उसका तकाज़ा जारी रहा- मुझे तो तू किशन के घर छोड़ आ, मुझसे न देखा जायेगा ये सब ... क्या जमाना आ गया है कुछ दबी जबान से कुढ़ती हुई बोली बेटी की कमाई खायेगा अब...

...बेटा खाने का स्वाद ले रहा था, पर माँ की हर बात सुन भी रहा था, माँ रुआँसी के नाटक के साथ बोली- जब तू ही मां-बाप की नहीं सुन रहा तो तेरी बेटी क्या ही कहना मानेगी!! बुढ्ढे-बुढ़ियों की सुनता ही कौन है अब, सब पढ़ लिख कर हमारे सिरों पर नाच रहे ...

फिर मानों किसी ने ‘एक्शन’ कहा हो, और वो ऊपर देखकर हुए पूरे अभिनय की रौ में बहती हुई चिल्लाने लगी- ओ जी सुनते हो, गोबिंद के बाऊजी! ये दिन दिखाने को मुझे छोड़ गये थे और पल्लू से झूठमूठ के आँसू पोंछती हुई बेटे की ओर देखते हुए बोली, तू ही बता इसका दादा होता तो तेरी छोरी की ये मनमानी चलती इस घर में ...

आज्ञाकारी बेटे ने रोटी ख़त्म करते हुए पानी गटका और मुस्कुराते माँ पास खिसकता हुआ आया और कुछ गंभीर स्वर में बोलना शुरू किया - नहीं माँ ! मैंने बहुत सोच समझकर उसके नौकरी करने का फैसला किया है!  घर की इज्जत मर्यादा की जितनी चिंता तुम्हें है उतनी मुझे भी है, पिताजी के नाम की पगड़ी बाँधी है माँ। और तुम्हारा आँचल भी सदा थामे रहूँगा,तुम्हें कहीं जाने की ज़रुरत नहीं। तुम तो जानती हो न जिस लड़के से वह शादी के लिए जिद्द कर रही है वह पिछले 4 साल से सरकारी नौकरी तलाश रहा है, और तुझे क्या पता सरकारी नौकरियाँ बची ही कितनी हैं, उम्र गुजर जायेगी उसकी फार्म भरते-भरते!! प्राइवेट नौकरी मिलने की भी गुंजाइश नहीं है।

फिर थोड़ा और नजदीक आकर आवाज़ को और धीरे किया माँ ने भी कान के पीछे हाथ लगाए, देख माँ, निधि को नौकरी की ‘आदत लग जाए’ तो वह लड़का खुद-ब-खुद ही निधि से अलग होने लगेगा... तब ! तब, सही मौका देख उसकी शादी कर देंगे!

अगर सच में ही ये बात है तो ठीक ही है एक बार शादी हो जाएगी तो शादी के बाद इस मुसीबत को इसके ससुराल वाले समझे... हमें क्या !

माँ ने बेटे के सिर को पुचकारते हुए आशीर्वाद का हाथ फेरा।

बेटे ने भी माँ के पल्लू से हाथ पोंछे और पत्नी पर चिल्लाते हुए कहा निधि को फ़ोन किया कितनी देर में आ रही है?

जी...जी वो तो आ चुकी है... मेरे साथ रसोई में है , माँ ने ख़ुशी छिपाकर डरते हुए कहा था

निधि की माँ को तसल्ली थी कि उसके पति गोबिंद और सास हरदोई का सारा प्लान फेल हो चुका था।  

 

 

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